श्रीमद्भगवद्गीता ब्रह्मविद्या है, योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है - jeevan-mantra

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Saturday, February 1, 2020

श्रीमद्भगवद्गीता ब्रह्मविद्या है, योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है

श्रीमद्भगवद्गीता- ऐसा सुमधुर गीत है, जिसे स्वयं भगवान् ने गाया है। धर्मभूमि-कुरुक्षेत्र में खड़े विश्वरूप विश्वगुरु श्रीकृष्ण ने कर्म का यह काव्य कहा है। इसमें सृष्टि की सरगम है- जीवन के बोल हैं। सृष्टि सृजन-स्थिति और विलय का कोई भी ऐसा रहस्य नहीं है- जिसे इस भगवद् गान में गाया न गया हो। इसी तरह जीवन के सभी आयाम- सभी विद्याएं इसमें बड़े ही अपूर्व ढंग से प्रकट हुई हैं। इस दिव्य गीत के सृष्टि सप्तक (सप्तलोक) को प्रकृति अष्टक (अष्टधा प्रकृति) के साथ स्वयं भगवती चित्शक्ति ने अपनी चैतन्य धाराओं में गूँथा है।

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श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय स्वयं भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के अन्त में कहा गया है।
‘‘ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीता सूपनिषत्सुब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे ........ नाम ..........अध्यायः।’’
ॐकार परमेश्वर का तत्-सत् रूप में स्मरण करते हुए बताया गया है कि यह भगवद् गान उपनिषद् है- यह ब्रह्मविद्या है, यह योगशास्त्र है, जो कृष्ण और अर्जुन संवाद बनकर प्रकट हुआ है। भगवद्गीता के इस परिचय में गहनता और व्यापकता दोनों है। यह भगवद्गीता, उपनिषदों की परम्परा में श्रेष्ठतम उपनिषद् है।

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इस उपनिषद् के आचार्य श्रीकृष्ण हैं और शिष्य धनुषपाणि अर्जुन हैं। आचार्य श्रीकृष्ण समस्त ज्ञान का आदि हैं और अन्त हैं। वे स्वयं अनन्त हैं। शिष्य अर्जुन-जिज्ञासु हैं, गुरुनिष्ठ हैं और अपने सद्गुरु भगवान् गुरु को पूर्णतया समर्पित हैं। सद्गुरु व सत्शिष्य की इसी स्थिति में ब्रह्मविद्या प्रकट होती है। सृष्टि व जीवन के सभी रहस्य कहे-सुने-समझे व आत्मसात् किए जाते हैं। परन्तु इन रहस्यों का साक्षात् व साकार तभी स्पष्ट होता है- जब शिष्य योग साधक बनकर सद्गुरु द्वारा उपदिष्ट योग साधना का अभ्यास करे। योग की विविध तकनीकों का इसमें प्राकट्य होने से ही गीता योगशास्त्र है।

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अन्त में यह कहा गया है कि उपनिषद् प्रणीत यह ब्रह्मविद्या- योगशास्त्र तभी समझा जा सकता है, जब कृष्ण-अर्जुन संवाद की स्थिति बने। जो अर्जुन की तरह गुरुनिष्ठ शिष्य नहीं है, उसका तो हमेशा भगवान् गुरु श्रीकृष्ण से विवाद ही रहता है। श्रीमद्भगवद्गीता तो केवल उनके अन्तस् में अपने स्वरों को झंकृत करती है, जो भगवान् के साथ समस्वरित है। संवाद की यह विशेषता बने तो आज भी पृथ्वीतत्त्व से बनी धर्मभूमि देह में परात्पर चेतना बनकर विद्यमान परमात्मा श्रीकृष्ण- जीवात्मा अर्जुन को निष्काम कर्म का काव्य सुनाते हैं।

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