Prerak Prasang : माता भगवती देवी शर्मा - jeevan-mantra

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Tuesday, December 18, 2018

Prerak Prasang : माता भगवती देवी शर्मा




विकृतियाँ दीखती भर ऊपर हैं, पर उनकी जड़ अन्तराल की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती है । यदि उस क्षेत्र को सुधारा, सँभाला, उभारा जा सके, तो समझना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया । भगवान् असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों का भांडागार हैं । उसमें संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की भी समग्र शक्ति हैं । वह मनुष्य के साथ सम्बन्ध घनिष्ठ करने के लिए भी उसी प्रकार लालायित रहता है, जैसे माता अपने बालक को गोद में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती हैं । मनुष्य ही है जो वासना, तृष्णा के खिलौने से खेलता भर रहता है और उस दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृतकृत्य हो सकता था । उसे समीप तक बुलाने और उसका अतिरिक्त उत्तराधिकार पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके बैठने के लिए साफ-सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए । यह स्थान अपना अन्त:करण ही हो सकता हैं ।







अन्त:करण की श्रद्धा और दिव्य चेतना के संयोग की उपलब्धि, दिव्य संवेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती हैं । यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है, अथवा मान्यता तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है, पर वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति अमृत निर्झरिणी उभरने जैसी होती है । इसका अवगाहन करते ही मनुष्य कायाकल्प जैसी देवोपम स्थिति में जा पहुँचता है । उसे हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दीख पड़ता है और समग्र लोकचेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है । ऐसी स्थिति में परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ बन जाता है ।

दूसरों की सुविधा अपनी प्रसन्नता प्रतीत होती है और अपनी प्रसन्नता का केन्द्र दूसरों की सेवा-सहायता में घनीभूत हो जाता हैं । ऐसा व्यक्ति अपने चिन्तन और क्रियाकलापों को लोक-कल्याण में, सत्प्रवृत्ति-संवर्धन में ही नियोजित कर सकता है । व्यक्ति के ऊपर भगवत् सत्ता उतरे, तो उसे मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में देखा जा सकता हैं । यदि यह अवतरण व्यापक हो, तो धरती पर स्वर्ग के अवतरण की परिस्थितियाँ ही सर्वत्र बिखरी दृष्टिगोचर होंगी ।






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